
RKTV NEWS/रवीन्द्र भारती,25 जुलाई।यह आलेख एक श्रद्धांजलि है…संगीत “कमाई का साधन” नहीं, बल्कि “समर्पण का माध्यम” है।…उन ध्वनियों को, जो कभी बोले नहीं गए – लेकिन अनुभव किए गए।…उस साधक को, जिसने मृदंग के माध्यम से संवाद रचा, और मौन के भीतर भी ताल खोज ली।
जब दुनिया चमकते मंचों और तेज रोशनी में कलाकारों की पहचान ढूँढ रही थी, तब बिहार के भोजपुर ज़िले की मिट्टी में एक साधक मौन रहकर ‘नाद’ का अनुसंधान कर रहा था। वह साधक थे – शत्रुंजय प्रसाद सिंह, जिन्हें देशभर में “बाबू ललन जी” के नाम से श्रद्धा मिली।
उनका जन्म जमीरा कोठी जैसे शांत और सांस्कृतिक परिवेश में हुआ था – जहाँ संगीत कोई प्रदर्शन नहीं, बल्कि प्रार्थना थी। मृदंग उनके लिए केवल वाद्य नहीं, बल्कि आत्मा की आवाज़ थी। उन्होंने अपने जीवन का हर क्षण इस ध्वनि–साधना में अर्पित किया, जहाँ हर ‘धा’, ‘तिन’, ‘ता’ उनकी अंतरात्मा से निकलता था।
ललन जी की कला में बनारस घराने की गहराई, मथुरा शैली की गरिमा और स्वयं की मौलिकता का अद्भुत संगम था। वे जब मृदंग पर तिहाई बाँधते, तो श्रोता लय में नहीं – भाव में बह जाते थे। वह ताल के भीतर ताल को जगाते थे – जैसे ध्वनि के सूक्ष्मतम कणों को भी स्पंदित कर देना उनका स्वाभाविक गुण था।

कथक के मंच पर जब नर्तक अपने पाँव से ताल खोजता, तब बाबू ललन जी अपने मृदंग से उसकी आत्मा को दिशा देते। उनकी संगति में रचना, तल्लीनता और तपस्या – तीनों एक हो जाते।लेकिन जो उन्हें विशिष्ट बनाता था, वह था उनका विनम्र स्वभाव और गुरुत्व का भाव। वे कहते थे –
“जब तक संगीत में सेवा नहीं, तब तक वह केवल शोर है।”
आज जब हम डिजिटल ध्वनियों और यांत्रिक तालों से घिरे हैं, बाबू ललन जी की याद हमें सिखाती है —
“संगीत तब जीवित होता है, जब वह आत्मा से निकले और आत्मा को छू जाए।”
सिर्फ 19 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी पहली स्वतंत्र पखावज वादन प्रस्तुति कोलकाता के एक प्रतिष्ठित संगीत सम्मेलन में दी, जहाँ उनकी वादन शैली ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस शुरुआत के साथ उनका नाम छोटे-बड़े महफ़िलों में गूंजने लगा और धीरे-धीरे उनकी कीर्ति पूरे भारतवर्ष में स्थापित हो गई।
पखावज के साथ-साथ उन्होंने तबले की भी उच्च स्तरीय शिक्षा प्राप्त की। उन्हें बनारस घराने के सुविख्यात गुरु पंडित विक्कु महाराज से तबला की पारंपरिक शिक्षा मिली, वहीं सन 1933 के लगभग उन्होंने तबले में पश्चिम बाज की गूढ़ शैली कराची (अब पाकिस्तान) के उस्ताद हसन बख्श खाँ से सीखी। इतना ही नहीं, उन्होंने कथक नृत्य की भी विधिवत शिक्षा पद्मविभूषण पंडित बिरजू महाराज के पिता स्व. अच्छन महाराज से प्राप्त की।
बाबू ललन जी की कला की झंकार केवल बिहार ही नहीं, बल्कि कोलकाता, जयपुर, उदयपुर, लखनऊ, दिल्ली और बनारस जैसे सांस्कृतिक केन्द्रों तक गूंजी। उनकी वादन शैली में परंपरा, कल्पना और आत्मा का अद्वितीय संगम था। उनके द्वारा प्रस्तुत तिहाइयाँ, परन और बोलों की स्पष्टता ने उन्हें “नाद योगी” के रूप में स्थापित किया।उनकी कला यात्रा केवल मंचों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने जमीरा कोठी को एक सांस्कृतिक तपोभूमि में बदल दिया, जहाँ उन्होंने निःस्वार्थ भाव से छात्रों को पखावज, तबला और कथक की शिक्षा दी। यह स्थान आज भी उनकी संगीत साधना और गुरुत्व की गूंज लिए हुए है।
उनकी साधना और शुद्ध कलात्मक दृष्टिकोण के लिए उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया गया, जिनमें प्रमुख हैं:
• राष्ट्रपति पुरस्कार
• संगीत नाटक अकादमी की फेलोशिप
• मार्दंगिक चक्र चूडामणि
• संगीत शिरोमणि
• संगीत मार्तण्ड
• लय भास्कर
• राज्यपाल पुरस्कार
• डांस एंड ड्रामा अवार्ड इत्यादि।
बाबू ललन जी का जीवन इस बात का सजीव उदाहरण है कि सच्चा कलाकार प्रदर्शन से नहीं, बल्कि परिश्रम, संयम और समर्पण से आकार लेता है। उन्होंने संगीत को कभी व्यवसाय नहीं बनने दिया, बल्कि एक आत्मिक उत्तरदायित्व के रूप में निभाया।
आज जब यंत्रवत संगीत और कृत्रिम लय की भरमार है, तब बाबू ललन जी की स्मृति हमें यह सिखाती है —
“संगीत तब जीवित होता है, जब वह आत्मा से निकले और आत्मा को छू जाए।”
वे केवल वादक नहीं थे, वे एक युग थे – जो आज भी हर गंभीर साधक के मन में ताल की तरह धड़कता है।
