
आरा/भोजपुर ( डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)08 मार्च।महिलाओं का सम्मान बढे ,प्रगति पथ पर अग्रसर हो, लिंग भेद के आधार पर इन्हें दरकिनार ना किया जाए, समान रूप से सभी क्षेत्रों में भागीदारी रहे, इसके लिए सदियों से प्रयास जारी है ,देश के संविधान में भी समान अधिकार दिए गए हैं ।लेकिन क्या वास्तविक रूप से ऐसा संभव हो पाया है? रूढ़िवादी से निकलकर महिलाओं को बराबरी का दर्जा मिल पाया है। इस पर विचार और वास्तविकता से रूबरू होने के लिए कुछ प्रबुद्ध और पदधारी महिलाओं से बातचीत के आधार पर विचार साझा किया गया।

सफलताओं के बाद भी सामाजिक अवधारणा अवरोधक: प्रो आभा सिंह प्राचार्या जेजे कॉलेज
महिला दिवस पर इन्होंने बताया कि महिलाएं पहले की अपेक्षा कई मामलों में आगे हैं और बढ़ रही है तथा इनका भविष्य भी उज्जवल नजर आता है। इन्हें अधिकार भी दिए गए हैं, कानून भी सहायक है परिवार से लेकर राजनीतिक पहल भी बढ़ी है। पहले सेना ,कृषि व्यापार ,विज्ञान ,स्वरोजगार, राजनीतिक आदि में कम की साझेदारी थी लेकिन अब वैसा नहीं है। सभी क्षेत्रों में अपनी काबिलियत का परचम लहरा रही है।
डॉक्टर सिंह ने बताया कि सब कुछ के बाद आज भी महिलाओं के प्रति समाज की जो अवधारणा है वह कहीं ना कहीं अवरोधक है।साथ ही हमारे कार्य क्षमता और मानसिकता को आहत करता है जिसे बदलने की जरूरत है।ऐसा भी देखा गया है की महिला पदधारी तो बन जाती है लेकिन पुरुषों के अधीन काम करती है जो उनकी अक्षमता को प्रदर्शित करता है। इन्होंने अपने संदेश में कहा की समस्याएं आती रहेगी ,सामना भी करना है और समाधान भी निकालना है। समस्या से भागना या छोड़ देना निदान नहीं है।इन्होंने बताया कि एक बार स्वामी विवेकानंद ने कहा है कि राम कई बार जन्म ले सकते हैं लेकिन सीता जैसी स्त्री एक बार जन्म लेती है,राम का रामत्व सीता पर निर्भर है।

पुरुष प्रधान मानसिक विकृतियों को बदलने की है जरूरत : डॉ अर्चना सिंह
दुनिया की आधी आबादी नारीशक्ति को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। लगभग 19वीं सदी से महिलाओं के लिए पद प्रतिष्ठा दिलाने का काम पुरुष प्रधान दुनिया में चल रहा है। अब लगभग अनेक देशों में महिला दिवस का जयगान सामाजिक,राजनीतिक ,संवैधानिक ,स्तर पर हो रहा है। लेकिन महिलाएं कितनी सशक्त हुई यह यक्ष प्रश्न सामने है। निश्चित रूप से महिलाओं की प्रगति शैक्षणिक सामाजिक राजनीतिक प्रतिष्ठा में वृद्धि हुई लेकिन जितना होना चाहिए उतना नहीं हो सका है। आज भी एक लड़की को परीक्षा या कहीं जाना होता है तो उसके अभिभावक साथ लेकर जाते हैं। यह कहीं ना कहीं सामाजिक बुराइयों की ओर इंगित करताहै। आजादी के 75 वर्ष बाद भी पूर्ण रूप से निडर, शिक्षित और सुरक्षित नहीं है। यह स्पष्ट कहे तो महिलाओं का सम्मान ,अधिकार संतोषप्रद नहीं मिल सका है। इस सामाजिक और मानसिक बुराई को हटाना पड़ेगा।

आदि काल से महिलाओं का सर्वप्रथम है स्थान: माया श्रीवास्तव
महिला शब्द अपने आप में गजब सुख देती है। एक महिला ही है जो मां,मौसी,दादी, नानी,बहन, मामी, चाची, के साथ साथ पत्नी , साली, सास सरहज जैसे रिश्ते की जनक महिला ही हैं।सभ्यता और संस्कृति को देखे तो आदि काल में भी महिला का स्थान पहला रहा है। सीता राम, राधे कृष्ण, पार्वती शंकर सब में प्रथम स्थान रही।आजादी के बाद से महिलाओं की स्थिति सुदृढ़ हुई है समाज में, लेकिन आज भी महिला अपने अधिकार से वंचित है। इसमें संदेह नहीं है कि सरकार के साथ साथ समाज भी महिलाओं को आगे बढ़ाने में सक्रिय हैं। परन्तु इस सत्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि आज भी महिला पुरुषों से प्रताड़ित हो रही है। जिंदा जला दी जा रही है और घरेलू हिंसा की शिकार हो रही है।महिला सशक्तिकरण से सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ी है।शिक्षा के साथ,आत्म निर्भरता बढ़ी है। धरती से अंतरिक्ष तक पहुंच चुकी महिला का योगदान।
जब हमारा समाज पितृसत्तात्मक मानसिकता से ऊपर उठ कर महिलाओं को भी पुरुषों के समान बराबरी का अधिकार केवल कागज पर नहीं वास्तविक रूप में प्रदान करेगा तो देश की विकास गति और तीव्र हो जाएगी।

शिक्षा के महत्व और नारी सशक्तिकरण की ताकत को पहचान गई है महिलाएं: सुशुमलता मुखिया दावा पंचायत
महिला दिवस पर तमाम नारी शक्ति को नमन करना चाहती हूं बधाई और शुभकामना देती हूं। पहले भी महिला दिवस मनाया जाता था लेकिन उसमें भी भूमिका पुरुषों की होती थी साथ ही ज्यादा औपचारिकता दिखती थी। लेकिन अब महिला दिवस उत्साह पूर्वक,महिलाओं की देखरेख में और उनके ही नेतृत्व में मनाया जा रहा है जो गौरव की बात है। अब महिला खुद की नेतृत्व करती है जिसका स्पष्ट उदाहरण भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू है। अब निश्चित रूप से महिलाएं हर क्षेत्र में चाहे शिक्षा का क्षेत्र या राजनीति का या फिर नौकरी का या देश की सीमा का,सब जगह पुरुषों की तरह सेवा देने में नजर आती है। वर्तमान समय में महिलाएं हर ग़लत काम का विरोध करती है चाहे घरेलू हिंसा हो, दहेज प्रतारणा हो या सामाजिक बुराई, पहले की तरह चुप नहीं रहती है बल्कि खुलकर दो दो हाथ करने को भी तैयार है।अब अधिकार का इस्तेमाल करने से कोई हिचकिचाहट नहीं है क्यों की शिक्षा के महत्व और नारी सशक्तिकरण की ताकत पहचान गई है।

नारी शक्ति की सफलता का उत्सव है महिला दिवस:डा सुनीता सिंह,समाजसेवी
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस,महिलाओं के संघर्ष की कहानी से शुभारंभ हुआ है। सैकड़ों महिलाएं काम करने की बेहतर परिस्थितियां,काम करने के घंटे और वोटिंग अधिकार के मांग को लेकर प्रदर्शन की थी।जिसकी आवश्यकता और सोच से आन्दोलन विदेश से मान्यता मिलते हुए राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने लगा।यह दिन महिलाओं को सम्मान देने का, उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए मनाया जाता है। मैं अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर तमाम उद्यमी,कामकाजी, सामाजिक राजनीतिक शैक्षणिक सार्वजनिक उपक्रमों में कार्य करने वाले महिलाओं को हृदय से बधाई देती हू की आप अपनी प्रतिभा और क्षमता के बल पर अपनी श्रेष्ठता बनाये रखें,एकजुट रहे,आनेवाला समय आपका है जिसमें सरकार और संविधान आपका बहुत बड़ा सहयोगी रहेगा। आप हर क्षेत्र में पुरुषो के बराबर और कई क्षेत्र में उनसे बड़े और बेहतर स्तर पर काम करती है।

कला क्षेत्र में महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा प्रोत्साहित करने की आवश्यकता: कथक नृत्यांगना आदित्या
प्रतिभा किसी की म़ोहताज नहीं होती है इसको प्रमाणित की है आरा की प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना आदित्य ने।आदित्या कथक के क्षेत्र की सुविख्यात कलाकार हैं,जो कथक प्रदर्शन हेतु देश-विदेश तक भ्रमण कर चुकी हैं।आदित्या ने भिखारी ठाकुर रचित बिदेशिया का शास्त्रीय नृत्यांकन किया है जिसे काफी लोकप्रियता मिली।इसके अलावे कई शिष्य शिष्याओं को कथक नृत्य में उच्च स्तरीय शिक्षा देकर प्रशिक्षित कर रही हैं। ‘नृत्य रत्न’ सम्मान से विभूषित आदित्या शिवादी क्लासिक सेंटर ऑफ आर्ट एंड म्युजिक की केंद्राधीक्षक हैं एवं बीपीएससी द्वारा शिक्षा विभाग में नृत्य शिक्षिका के पद पर कार्यरत हैं। आदित्या गुरु बक्शी विकास की रचना अष्टरूपक ताल को प्रस्तुत करने वाली प्रथम नृत्यांगना हैं। विश्व रिकॉर्ड में दर्ज पटना की गंगा महाआरती में प्रमुख नृत्यांगना की भूमिका आदित्या की रचना ”गंगा एक गाथा” एवं म्युजिक एल्बम ‘असुर संहारिणी’ से इनकी लोकप्रियता कला जगत में सिर चढ़ के बोल रही है।
इन्होंने महिला दिवस के पूर्व संध्या पर बताया की महिलाओ के लिए नृत्य का क्षेत्र संघर्षों से भरा रहता है। कई महिलाओ को आज भी पारिवारिक एवं सामाजिक विरोध झेलना पड़ता है जबकि इस क्षेत्र में महिलाओं ने कई कीर्तिमान स्थापित किया है। कई महिला नृत्यांगनाओं ने नये दृष्टिकोण से समाज के लिए उदाहरण स्थापित किया है। नृत्य के क्षेत्र में सितारा देवी, मृणालानी साराभाई, रुकमणि देवी अरुंडेल, सोवना नारायण जैसे अग्रणी कलाकारों ने महिला प्रतिभाओं को प्रेरित किया है। समाज को कला क्षेत्र में महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।
