
RKTV NEWS/बक्शी विकास 06 मार्च।संगीत जब कलाकार का जुनून बन जाए तो इतिहास स्वयं उसे लिखता है। कुछ ऐसी ही कहानी है जयपुर के तबला गुरु ठाकुर किशन सिंह उर्फ आरा के कृष्णा नंदन लाल( कृष्णरंजन जी) जी की। ये दो नाम एक ही व्यक्तित्व के दो जीवन की सच्चाई है। तबला गुरु ठाकुर किशन सिंह जी की बात करें तो तबला के क्षेत्र में पहला राजस्थान संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सन् 1989-90 में किशन सिंह जी को मिला जिनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर के संगीत विभाग की एसोसिएट डॉ. प्रभा भारद्वाज जी के निर्देशन में डॉ. त्रिपुरारी सक्सेना ने शोध किया। राजस्थान विश्वविद्यालय द्वारा सन् 2015 का यह शोध एक पुस्तक के रूप में विकसित हुआ जिसका नाम है ” तबला गुरु पंडित ठाकुर किशन सिंह का व्यक्तित्व एवं कृतित्व”। इनके व्यक्तित्व का अंदाज़ा इस बात से भी लगा सकते हैं कि जयपुर में इनके नाम से विगत 23 वर्षो से “तबला गुरु ठाकुर किशन सिंह स्मृति शास्त्रीय संगीत समारोह” निरंतर आयोजित होता आ रहा है जिसमें बनारस घराने के पंडित रामकुमार मिश्र युवा कलाकारों में श्री अभिषेक मिश्रा, श्री यशवंत वैष्णव जैसे लोकप्रिय तबला वादक समेत कई ख्यातिलब्ध कलाकार शिरकत करते हैं एवं ठाकुर साहब के नाम का सम्मान देश के शीर्ष के कलाकारों को प्रदान किया जाता है। ठाकुर साहब के शिष्यों में श्री विजय सिंह और श्री अमरजीत सिंह, श्री महेश दलवी, समी मोहम्मद तो कनाडा जैसे देश में गुरु की शिक्षा को नया आयाम दे रहें हैं वही अन्य शिष्यों में डॉ. उर्मिला उपाध्याय, डॉ. मधु भार्गव एवं डॉ. शोभा भार्गव का नाम उल्लेखनीय है जो विभिन्न जगहो पर लेक्चरर के पद की शोभा बढ़ा रही हैं। ये संक्षिप्त परिचय है तबला गुरु ठाकुर किशन सिंह जी का पर इनका एक और अनसुना परिचय आज आपसे करवाता हूँ।
7 दिसंबर 1929 को आरा (भोजपुर) के मथवलीया गाँव के एक सभ्रांत कायस्थ परिवार में ठाकुर किशन सिंह जी का जन्म हुआ कृष्णा नंदन नंदन लाल( कृष्णरंजन जी) के रूप में। पिता स्व. रघुनाथ सहाय पुलिस ऑफिसर थे जो कृष्ण रंजन जी को राजपत्रित अधिकारी बनाने का सपना पाल रखे थे किंतु नियति ने कुछ और ही तय कर रखा था। छोटे कृष्ण रंजन ने गुरु बनवारी लाल से तबले पर हाथ रखना सिखा। उस दौर में ताल के प्रकांड विद्वान जमीरा के राजा बाबू ललन जी के नाम से विख्यात संगीत शिरोमणि शत्रुंजय प्रसाद सिंह जी का शिष्य होना बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती था लिहाजा अपनी प्रतिभा के बदौलत कृष्ण रंजन जी ने न केवल शिष्यत्व प्राप्त किया अपितु बाबू ललन जी के श्रेष्ठ शिष्यों में अपना नाम शुमार किया। देश के कई बड़े सम्मेलनों में बाबू ललन जी स्वयं कृष्ण रंजन जी को शिष्याओं के साथ संगत हेतु भेजा करते थें। छात्र जीवन में ही इन्हे स्वर्ण पदक भी प्राप्त हुआ। महज 8वीं कक्षा में ही कृष्ण रंजन जी का विवाह दुल्हीन बाजार (पटना) निवासी स्व.गंगलाल की सुपुत्री सरस्वती देवी से हो जाता है इसी बीच पिता का स्वर्गवास हो जाता है और माँ तो पहले ही गुजर चुकी थीं। कृष्ण रंजन जी के तबला के प्रति इस अद्वितीय प्रेम में कुछ पराथितिवश बाधाएं आनी शुरू हुई । कम आयु में माता पिता के न होने से अन्य बड़ों के अनुशासन में रहना इनकी मजबूरी बन गई। फिर कुछ ऐसा हुआ कि बड़े भतीजे के शादी से एकाएक धन-दौलत पत्नी और बच्चे समेत भरापूरा परिवार का त्याग कर कृष्ण रंजन जी निकल पड़ें अपनी साधना के मार्ग पर और विलक्षण प्रतिभा कृष्ण रंजन गुमनाम हो गया। कई वर्षो बाद अशोक जी एक श्रोता बनकर तबला गुरु किशन सिंह का तबला सुनने जयपुर गए जहाँ बड़ी दिक्कत से ठाकुर साहब तबला सुनाने को तैयार हुए। तबला वादन के बाद अशोक जी ने अपने पिता को अपना परिचय दिया तो दोनों लिपट के रोने लगें। जरा सोचिये आखिर ऐसी क्या वजह होगी जिसकारण ठाकुर साहब को इतना बड़ा निर्णय लेना पड़ा, त्याग करना पड़ा। कुछ लोगो का कहना है कि कई वर्षो तक परिवार में संगीत विरोधियों के कारण छुप छुपा कर सांगीतिक गतिविधियों में रहते थें। लिहाजा तब लोगों ने इस विलक्षण प्रतिभा को समझा होता तो कृष्ण रंजन का नाम गुमनाम न होता। 30 मार्च 2002 को इनका निधन हो गया। कहते हैं प्रतिभा किसी की मोहताज नही होती और यही सच है प्रतिभा ने केवल अपना नाम बदला और तबला गुरु पंडित ठाकुर किशन सिंह ” के नाम का नक्षत्र संगीत के आकाश में स्थापित हो गया। लेखक कथक नर्तक हैं लिहाजा नृत्य संगत करने वालो के विषय में बातचीत के दौरान कृष्ण रंजन जी का नाम मात्र किसी से सुना था पर विस्तृत जानकारी नही हो पाई क्योकि इस महान व्यक्तित्व पर पूरा आरा मौन था। इस मौन की वजह से आज सवाल यह रह गया कि जयपुर के तबला गुरु ठाकुर किशन सिंह उर्फ आरा के कृष्णा नंदन लाल (कृष्ण रंजन जी) या आरा के कृष्णा नंदन लाल (कृष्ण रंजन जी) उर्फ जयपुर के तबला गुरु ठाकुर किशन सिंह????

