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भोपाल:डॉ. आम्बेडकर का चिन्तन उद्देश्यपूर्ण अवश्य है किन्तु पक्षपात पूर्ण नहीं:भंते शाक्यपुत्र सागर थेरो

RKTV NEWS/भोपाल (मध्यप्रदेश)06 दिसंबर।आज 06 दिसंबर को प्रातःकाल 10:00 बजे दी बुद्धभूमि धम्मदूत संघ द्वारा डॉ बाबासाहब भीमराव अंबेडकर जी के 68वे महापरिनिर्वान निर्माण दिवस के अवसर पर आयोजित “सर्वधर्म मानवंदना समारोह” में धर्मगुरुओ द्वारा डॉ अंबेडकर प्रतिमा,बोर्ड ऑफिस चौराहा भोपाल में महंत अनिलानंद महाराज,प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष, अखिल भारतीय संत समिति भोपाल ,विशेष अतिथि -सूफी मुशाहिद उज जाम ख़ानचिश्ती,अध्यक्ष-इंटर नेशनल इस्मालिक सूफी फाउंडेशन,भोपाल,फ़ादर अल्फ़ेड डिसूजा,पीआरओ,भोपाल कैथोलिक महाधर्मप्रांत,भोपाल, ज्ञानी गुरूविन्दर सिंह,ग्रंथि ,गुरुद्वारा, गुरुचरण सिंह अरोरा, प्रवक्ता, मुख्य अतिथि किशन सूर्यवंशी,अध्यक्ष-नगर निगम भोपाल,कार्यक्रम संयोजक- भंते शाक्यपुत्र सागर थेरो ,अध्यक्ष – दी बुद्धभूमि धम्मदूत संघ सभी ने पुष्फ अर्पित कर दीप प्रज्वलित कर महापरिनिर्वाण दिवस पर अभिवादन कर श्रद्धासुमन अर्पित किया।
इस अवसर पर महंत अनिलानंद महाराज,प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष,
अखिल भारतीय संत समिति भोपाल ने कहा की अगर अंबेडकर नहीं होते तो हम नहीं होते उन्होंने आगे कहा की जब जब धरती पर अत्याचार, शोषण, अन्याय बड़ता है तब तब ऐसे दैवीय शक्तियां अर्थात् अंबेडकर जैसे लोग धरती पर जन्म लेते हैं।सभी धर्म के धर्म गुरु ने डॉ भीमराव अंबेडकर जी को अपने अपने धर्म से श्रद्धासुमन अर्पित किए।
इस अवसर पर भंते शाक्यपुत्र सागर थेरो,बौद्धगुरु ने कहा कि डॉ. आम्बेडकर का चिन्तन उद्देश्यपूर्ण अवश्य है किन्तु पक्षपात पूर्ण नहीं।वे एक विवेकशील व्यक्ति थे जो तर्क और यथार्थ को चिन्तन का आधार मानते थे। उनका चिन्तन अनुभवजन्य था न कि भावना अथवा कोरी कल्पना पर आधारित। उनकी अधिकांश स्थापनायें ऐतिहासिक तथ्यों, साक्ष्यों एवं प्रमाणों पर आधारित होती थीं क्योंकि उन्हें यह ज्ञात था कि बिना यथार्थ व तर्कसंगत व्याख्या के किसी सामाजिक समस्या का इस प्रकार हल ढूँढ़ना संभव नहीं है। इसलिये कतिपय उद्धरणों, जहाँ उनकी आहत दलित आत्मा दलित समाज की दासता के लिये उत्तरदायी वर्गों एवं शास्त्रों के विरुद्ध. विद्रोह का लावा उगलती है, को छोड़कर उनका अधिकांश चिन्तन वैज्ञानिक यथार्थ पर आधारित है।
आगे कहा कि डॉ. आम्बेडकर एक समाज वैज्ञानिक थे। उन्होंने आर्थिक, राजनैतिक, विधिक एवं सामाजिक तथ्यों का विवेचन प्रत्यक्ष अनुभव एवं तटस्थ विश्लेषण के आधार पर किया। जहाँ तक सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक समूहों में विद्यमान सम्बन्धों की प्रकृति को सामाजिक संरचना के सन्दर्भ में स्पष्ट करने का प्रश्न है डॉ. आम्बेडकर की दृष्टि समाजशास्त्रीय थी।
किशन सूर्यवंशी,अध्यक्ष-नगर निगम ने कहा कि डॉ. भीमराव रामजी आम्बेडकर आधुनिक युग के उन विरले पुरुषों में थे जिन्होंने युग व समाज की स्थापित व्यवस्था एवं वैचारिकी की न तो अधीनता स्वीकार की और न ही उनसे समझौता किया। वे परम्परात्मक समाज की अन्याय एवं शोषणकारी शक्तियों के विरुद्ध जीवन पर्यन्त संघर्ष करते रहे। संविधान के माध्यम से 26 जनवरी 1950 को संविधान की मसौदा समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने भारत में अन्याय एवं शोषण से रहित एक बेहतर युग एवं बेहतर समाज की आधारशिला रखी।
कार्यक्रम में बुद्धभूमि महाविहार उपासक संघ, मैत्रीय बुद्ध महाविहार उपासिका संघ एवं समस्त अंबेडकरी अनुयायी उपस्थित थे।

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