-ठिया और बैठकी : दो शैलियों में जीवंत है पाला का मंच

-वाद्य, वेश और संवाद से सजता है मंच, पर उम्रदराज होते कलाकार और उदासीन नई पीढ़ी बनी सबसे बड़ी चुनौती
RKTV NEWS/अनुराग प्रकाश पंडा,25 अक्टूबर । भारत की सांस्कृतिक विविधता के बीच ओडिशा की अनूठी लोक नाट्य परंपरा ‘पाला’ संरक्षण के अभाव में आज विलुप्ति के कगार पर पहुंच गई है। छत्तीसगढ़ के ‘नाचा’ की तरह ही यह मनोरंजन के साथ-साथ पौराणिक कथाओं और जन-जागरूकता का सशक्त माध्यम रही है। संगीत और साहित्य का अनूठा संगम यह लोक नाट्य धार्मिक व नैतिक संदेशों के जरिए समाज को जागरूक करने की प्रबल क्षमता रखता है। आधुनिकता की दौड़ में अपनी पहचान खोती जा रही इस समृद्ध पारंपरिक धरोहर को सहेजने के लिए अब गंभीर सांस्कृतिक प्रयासों की दरकार है।
इस प्राचीन लोकनाट्य का मूल उद्देश्य भक्ति माना जाता है, जिसके कारण स्थानीय लोग आज भी दशहरा और बसंत पंचमी जैसे धार्मिक अवसरों पर इसे बड़े पैमाने पर प्रस्तुत करते हैं। हालांकि, भौगोलिक रूप से इसका दायरा ओडिशा के कुछ ही हिस्सों और ओडिशा-छत्तीसगढ़ सीमावर्ती क्षेत्रों तक सिमट कर रह गया है, जो इस कला के धीरे-धीरे विलुप्त होने की ओर इशारा करता है।
लोक कला कहते ही हमें यह समझ आ जाता है कि यह कला रूप लोक का है, इसका कोई एक जन्मदाता नहीं है। वैसे ही स्थानीय लोग तथा कुछ वरिष्ठ लोग जिन्होंने अपने जीवन काल में एक लम्बा समय इस कला रूप के साथ बिताया है, उनके मत के अनुसार इसकी उत्पत्ति भक्ति के उद्देश्य से हुई थी। पहले लोग प्रभु जगन्नाथ की लीलाओं व उनकी कथाओं को गीत संगीत के माध्यम से प्रस्तुत कर, माता दुर्गा, शिव जी की कथाओं का गुणगान के माध्यम से अपने भक्ति भाव को प्रकट करते थे।
यदि विकास क्रम की बात करें तो यहीं से उन्हीं लोककलाकारों द्वारा इसमें अभिनय जोड़ा गया और मूल कथानक भी समय के साथ बदल कर रामायण, महाभारत और भगवत गीता जैसे विषयों पर आ गया। आज के समय की बात करें तो इसमें कुछ समूहों द्वारा सामाजिक मुद्दों पर भी प्रस्तुतियां देखने को मिलती हैं।
यह प्रस्तुति मुख्य रूप से आठ से दस लोगों के एक समूह द्वारा की जाती है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘मंडली’ कहा जाता है। इन मंडलियों का नाम आमतौर पर उनके गांव या मुख्य गायक के आधार पर रखा जाता है। इसकी संरचना और स्वरूप को समझने के लिए इसकी शैलियों को जानना आवश्यक है, जो मूल रूप से दो प्रकार की होती हैं। ठिया पाला – ओड़िया भाषा में ‘ठिया’ का अर्थ खड़े होना होता है। इस शैली में कलाकार खड़े होकर अपनी प्रस्तुति देते हैं, जिसमें गीत के साथ-साथ नृत्य और अभिनय भी प्रमुख रूप से शामिल होते हैं। यह पाला की अधिक व्यापक और लोकप्रिय शैली है।
बैठकी पाला – इस शैली में कलाकार बैठकर केवल गीत और संवाद के माध्यम से अपनी प्रस्तुति देते हैं।
इन दोनों प्रमुख शैलियों के अलावा, कथानक या प्रसंग के आधार पर इसके कुछ अन्य रूप भी प्रचलित हैं, जैसे – भागवत पाला, सत्यपीर पाला और बाइसी पाला। हालांकि, मुख्य प्रदर्शन शैलियों के रूप में ‘ठिया’ और ‘बैठकी पाला’ ही सर्वप्रमुख हैं।
प्रस्तुति पक्ष में, सबसे पहले मुख्य गायक मंच के बीच रखी लकड़ी की चौकी (जिसे ओड़िया में ‘खटली’ कहते हैं) पर प्रभु जगन्नाथ या मां सरस्वती की तस्वीर के सामने दीया, अगरबत्ती और फूल अर्पित कर पूजा-अर्चना और वंदना करते हैं, जिसके बाद मुख्य कथा शुरू होती है। इस प्रस्तुति की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं-
रोचक शैली – धार्मिक और पौराणिक कथाओं को हास्य-व्यंग्य, गीत, नृत्य और दर्शकों के साथ सीधे संवाद व प्रश्नोत्तर के माध्यम से बेहद दिलचस्प बनाया जाता है।
अवधि – इस अनूठी शैली की प्रस्तुति तीन से चार घंटे या कभी-कभी पूरी रात चलती है, जिसे दर्शक अंत तक पूरी तन्मयता के साथ देखते हैं।
इसमें मुख्य कलाकार, जिसे ‘श्री गायक’ या ओड़िया में कई जगहों पर ‘बाहक’ कहा जाता है, मुख्य कहानी, गीत और श्लोक सुनाते हैं। उनके साथ बाकी कलाकार, जिन्हें ‘पालिया’ कहा जाता है, गीतों को दोहराते हैं और अभिनय करते हैं। मृदंग वादक, जिन्हें ‘बायका’ कहा जाता है, गले में मृदंग टांगकर गीत दोहराने के साथ-साथ वादन और अभिनय पक्ष भी संभालते हैं। इसकी पूरी प्रस्तुति बेहद नाटकीय, व्यंग्यात्मक और हास्यात्मक शैली में होती है।
पौराणिक दृष्टि से पाला के 16 प्रकार माने जाते हैं, जो कथानक पर आधारित होते हैं। यही कारण है कि ओड़िशा में इसे ’16 पाला’ भी कहा जाता है। इसके अलावा, समय के साथ मनोरंजन के नए दृष्टिकोण से कई शैलियां विकसित हुईं, जिनमें से एक है ‘बादी पाला’। इसमें दो समूह एक साथ प्रस्तुति देते हैं और किसी एक कथानक को लेकर दोनों के बीच वाद-विवाद होता है। वे एक-दूसरे पर तंज और व्यंग्य कसते हुए वाद-विवाद के माध्यम से दर्शकों तक संदेश पहुंचाते हैं।

परंपरागत लोक-कला में वाद्य, वेशभूषा और मंच सज्जा
प्रस्तुति के दौरान वाद्य यंत्रों की बात करें तो मृदंग, झांझ, मंजीरा और हारमोनियम इसके प्रमुख वाद्य हैं। इनमें से मृदंग और मंजीरा को ओड़िया भाषा में क्रमशः ‘मुरदंग’ और ‘गिनी’ कहा जाता है, जबकि शेष दोनों यंत्र अपने सामान्य नामों से ही जाने जाते हैं। कलाकारों की वेशभूषा की ओर बढ़ें तो मुख्य गायक धोती, कुर्ता, पगड़ी और फूलों की माला धारण करता है, वहीं अन्य पालिया कलाकार अपनी-अपनी भूमिकाओं के अनुसार धोती के साथ कुछ रंगीन और भव्य वस्त्र पहनते हैं। जहां तक मंच सज्जा का प्रश्न है, इस विधा में किसी विशेष सजावट की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि यहां अभिनय को ही सर्वोपरि माना गया है। प्रस्तुतियां आमतौर पर छोटे-छोटे तंबुओं के नीचे ऊपर माइक टांग कर दी जाती हैं, जबकि कई मझे हुए पुराने कलाकार बिना माइक के भी अपनी कला का प्रभावी प्रदर्शन करते हैं।
इस लेख में मैंने कई बार ‘विलुप्ति के कगार’ शब्द का प्रयोग किया है, जिसका उद्देश्य केवल इस कला रूप की वर्तमान स्थिति से अवगत कराना है। आज यह कला इसलिए विलुप्त होती जा रही है क्योंकि इसके अधिकांश कलाकार बढ़ती उम्र के कारण प्रस्तुति देने में असमर्थ होते जा रहे हैं और नई पीढ़ी की इसमें कोई रुचि नहीं है। डिजिटल युग के प्रभाव के कारण लोगों का ध्यान इस ओर से पूरी तरह हट गया है।
यह कला न केवल ओडिशा बल्कि पूरे भारत की संस्कृति का एक सुंदर हिस्सा है। इसका मुख्य कार्य केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि गीत, संगीत, अभिनय और नृत्य के माध्यम से लोगों को हंसाते-गुदगुदाते जीवन के नैतिक मूल्य सिखाना और जन-जागरण करना है, जिसे यह बखूबी निभाती है। इस लेख को लिखने का मुख्य उद्देश्य यही है कि लोग ऐसी लोक कलाओं के प्रति जागरूक हों, उन्हें जानें और समझें, ताकि वे विलुप्त होने से बच सकें।

