राजपरिवार के त्याग को किया नमन, सांस्कृतिक संध्या में मंत्रमुग्ध हुए दर्शक।
खैरागढ़/छग (रवींद्र पांडेय)। 15 अक्टूबर। राजकुमारी इंदिरा सिंह कला संगीत विश्वविद्यालय का 70वां स्थापना दिवस गरिमामय और भव्य माहौल में आयोजित किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि राज्यपाल एवं कुलाधिपति रमेन डेका, विशिष्ट अतिथि सांसद संतोष पांडे, कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा तथा संस्थापक राजपरिवार की सदस्य शताक्षी सिंह सहित कई गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान, राज्य गीत और विश्वविद्यालय कुलगीत से हुई। इसके बाद अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलन और संस्थापक राजा वीरेंद्र बहादुर सिंह, रानी पद्मावती व राजकुमारी इंदिरा सिंह के चित्रों पर माल्यार्पण कर किया गया।
डिजिटल मीडिया से लोककला का प्रचार-प्रसार करें : राज्यपाल
छत्तीसगढ़ के राज्यपाल और कुलाधिपति रमेन डेका ने संस्थापक राजपरिवार की दूरदर्शी सोच और ऐतिहासिक योगदान को नमन किया। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोककलाओं जैसे पंडवानी, पंथी, राउत नाचा और जनजातीय परंपराओं को मोबाइल व डिजिटल माध्यमों से वैश्विक पहचान दिलानी चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों को कला को आजीविका से जोड़ने के साथ धैर्य व निरंतर अभ्यास का संदेश दिया।
राजपरिवार का त्याग अनुकरणीय : सांसद
सांसद संतोष पांडे ने कहा कि अपनी पुत्री की स्मृति में पूरा महल और संपत्ति दान कर विश्वविद्यालय की स्थापना करना अद्वितीय उदाहरण है। इसी त्याग की बदौलत आज खैरागढ़ को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है।
विश्वविद्यालय की उपलब्धियां व चुनौतियां : कुलपति
कुलपति डॉ. प्रो. लवली शर्मा ने संस्थान की 70 वर्षों की गौरवशाली विकास यात्रा का ब्योरा दिया। उन्होंने बताया कि नेपाल, बांग्लादेश, मॉरीशस, श्रीलंका और दक्षिण अफ्रीका सहित कई देशों के विद्यार्थी यहां अध्ययनरत हैं। साथ ही उन्होंने शासन से शिक्षकों, संगत कलाकारों की कमी दूर करने व अतिरिक्त भवनों के निर्माण में सहयोग का आग्रह किया।
कला शिक्षकों की नियुक्ति का सुझाव
कार्यक्रम का संचालन कर रहे अधिष्ठाता डॉ. राजन यादव ने प्रदेश के प्रत्येक जिले के कम से कम 10 हायर सेकेंडरी स्कूलों में ललित कला शिक्षकों की नियुक्ति का सुझाव दिया, ताकि ग्रामीण प्रतिभाओं को शुरुआत से ही प्रोत्साहन मिल सके।
सुर, ताल और लोकसंस्कृति की शाम ने बांधा समां
स्थापना दिवस की सांस्कृतिक संध्या में शास्त्रीय संगीत, कथक और लोकनृत्य का अद्भुत संगम देखने को मिला, जो देर रात तक चला। मुंबई के डॉ. जुनैन हलीम खान ने राग हमीर में सितार की तानों और रूपक व तीनताल में गतों की प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। तबले पर डॉ. हरिओम हरि ने संगत की। इंदौर की डॉ. सुचित्रा हरमलकर ने तीनताल की बंदिशों के साथ नृत्य के माध्यम से ‘सीता स्वयंवर’ के पौराणिक प्रसंग को जीवंत रूप में मंच पर साकार किया। इस दौरान मृणाल नागर ने तबले, मन्न माताई ने हारमोनियम एवं गायन, उस्ताद शफीक हुसैन ने सारंगी और डॉ. योगिता मांडलिक ने पढ़ंत के माध्यम से संगत की। पद्मश्री डॉ. राधेश्याम बारले और उनके दल ने छत्तीसगढ़ी पंथी नृत्य की ऊर्जावान थाप और लयबद्ध प्रस्तुति से दर्शकों को झूमने पर मजबूर कर दिया।
माल्यार्पण व मुख्य समारोह में प्रभारी कुलसचिव आर. वेंकट रमण गुडे, विभिन्न संकायों के अधिष्ठातागण प्रो. नमन दत्त, प्रो. मानस साहू, डॉ. देवमाईत मिंज, सहायक कुलसचिव डॉ. विजय सिंह, प्राध्यापक, कर्मचारी तथा बड़ी संख्या में शोधार्थी व विद्यार्थी उपस्थित रहे।

