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भोजपुर : विद्यालयों के नाम मे परिवर्तन करने से लोगों मे नाराजगी।

शाहपुर/भोजपुर (राकेश मंगल सिन्हा) 27 जुलाई। सूबे मे सरकारी विद्यालयों के नाम बदलने की कवायद ने लोगों को नये विषय पर चर्चा करने पर मजबूर कर दिया है। सरकार ने राज्य के 551 विद्यालयों का नाम बदलकर सरस्वती विद्या निकेतन (आदर्श विद्यालय) कर दिया है। सरकार का कहना है कि इससे विद्यालयों का शैक्षणिक स्तर अच्छा होगा। सरकार के इस कदम ने बुद्धिजीवियों, आम लोगों और राजनीतिज्ञों के बीच एक नई बहस को जन्म दिया है। सरकार का यह कदम पूरे बिहार मे चर्चा का विषय बना हुआ है। शाहपुर भी इससे अछूता नहीं है। इसकी आंच शाहपुर मे भी पहुँच चुकी है। शाहपुर के बुद्धिजीवियों और आम लोगों मे भी आक्रोश दिख रहा है। लोग अलग-अलग तरीके से अपना विरोध व्यक्त कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि नाम बदलने से सरकारी शिक्षा के स्तर को अच्छा नहीं किया जा सकता है। पिछले 20 साल से बिहार मे एनडीए की सरकार है। इसके बावजूद भी सरकारी विद्यालयों मे शिक्षा का स्तर अपेक्षाकृत सही नहीं हो सका है। लोगों का कहना है कि अगर सरकारी विद्यालयों मे शिक्षा का स्तर अच्छा होता तो नित्य नये-नये प्राइवेट स्कूल नहीं खुलते। सरकारी विद्यालयों मे फीस कम होने के बावजूद भी लोग अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल मे पढ़ा रहे हैं। जबकि सरकारी स्कूल मे सरकार बच्चों को कई तरह की सुविधा प्रदान कर रही है। उसके बावजूद भी प्राइवेट स्कूल खुल रहे हैं और चल रहे हैं। शाहपुर के मुन्ना पांडे का कहना है कि सरकार शिक्षा के विकास के नाम पर शिक्षा का भगवाकरण कर रही है और पूर्वजों द्वारा दान किए गए बहुमूल्य जमीन और विद्यालयों से उनके नाम को हटाने की साजिश की जा रही है। बलदेव पांडे उर्फ पुतुल पांडे, पप्पू पांडे, शिव प्रसन्न यादव, शिव कुमार सिंह कुशवाहा जैसे लोगों का कहना है कि सरकार शिक्षा के नाम पर राजनीति कर रही है। शाहपुर नगर पंचायत के जदयू नेता, पूर्व उप मुख्य पार्षद तथा उप मुख्य पार्षद झुनिया देवी के प्रतिनिधि गुप्तेश्वर साह ने इस निर्णय पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे शिक्षा का भगवाकरण और राजनीति से प्रेरित कदम करार दिया है। उन्होंने कहा कि यह विद्यालय इस क्षेत्र का ऐतिहासिक धरोहर है। उन्होंने कहा कि बाबू हरि नारायण सिंह ने अपनी बेशकीमती जमीन इस विद्यालय को बनाने के लिए दान की ताकि क्षेत्र के लोग शिक्षित हो सकें। इस विद्यालय को बनाने मे ग्रामीण लोगों ने भी अपने हैसियत के अनुसार मदद की। लोग उस जमाने मे भी प्रतिदिन मुट्ठी भर अनाज विद्यालय के नाम पर निकालते थे और विद्यालय के निर्माण में अपना सहयोग दिये थे।
बाबू हरि नारायण सिंह ने इस विद्यालय की नींव 1905 मे रखी और 1905 मे ही विद्यालय की स्थापना हुई।1940 मे इस विद्यालय को मान्यता मिल गई। शाहाबाद डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की स्थापना 1938 मे हुई। बाबू हरि नारायण सिंह 1938 मे बने डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के वाइस चेयरमैन थे। 1938 मे बने डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के चेयरमैन, वाइस चेयरमैन सहित कमिटी के सदस्यों का नाम संगमरमर की पट्टी पर अंकित है जो जिला परिषद भवन के बरामदे मे लगा हुआ है। बाबू हरि नारायण सिंह उस जमाने मे कलकत्ता विश्वविद्यालय के ग्रेजुएट थे। एनडीए की सरकार ऐतिहासिक महत्व के लोगों के नाम को भी हटाने पर आमदा है। यह मामला सिर्फ शाहपुर के हरि नारायण प्लस टू उच्च विद्यालय का नहीं है बल्कि पूरे बिहार के विद्यालयों का है। उस जमाने मे सक्षम और संपन्न लोगों ने अपने क्षेत्र के लोगों को शिक्षित करने के लिए अपनी बेशकीमती जमीन मे विद्यालय बनवाया था ताकि लोग शिक्षित हो सकें और समाज मे सुधार लाया जा सके। ऐसे समाज सुधारकों के नाम को हटाना उनके और उनके वंशजों के प्रति घोर अन्याय है। विद्यालय क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान और गौरव से जुड़ा हुआ है। बाबू हरि नारायण सिंह के नाम पर स्थापित विद्यालय का मूल नाम बदलना क्षेत्र के इतिहास, सांस्कृतिक विरासत और जन भावनाओं के अनुरूप नहीं माना जा रहा है। लोगों का कहना है कि क्षेत्र की जन भावनाओं एवं ऐतिहासिक विरासत का सम्मान करते हुए मूल नाम को यथावत ऊपर रखते हुए नीचे सरस्वती विद्या निकेतन जोङा जाय अथवा सरकार सरस्वती विद्या निकेतन (आदर्श विद्यालय) के नाम से नया विद्यालय खोले।

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