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समता पार्टी की जातिय जन गणना विरोधी मशाल बुझ गई ।

पटना/बिहार( रवि शेखर प्रकाश)01 अप्रैल ।बिहार में होने वाली जातिय जनगणना के विरोध में समता पार्टी ने अपनी राजनीतिक मशाल जलाने का प्रयास किया , जिसे प्रशासन ने बुझा दिया ।समता पार्टी का गठन 1994 में पुर्व रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीस के नेतृत्व में हुई थी।जिसकी विचारधारा समाजवादी है ।समता पार्टी ने ही पहली बार बिहार के मुख्य मंत्री के रुप में नितीश कुमार को मौका दिया है।2003 में समता पार्टी के सदस्य जनता दल युनाइटेड में चले गये लेकिन सांसद ब्रह्मानंद मंडल गुट ने समता पार्टी को जिंदा रखा ।अब इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय मंडल है और राष्ट्रीय महासचिव निशा जम्बोदकर जी है।
आखिर जातिय जनगणना का विरोध क्यों?
जाति जनगणना के विरोधी अपना तर्क देते है की इससे जातिवाद को बढावा मिलेगा और समाज में एक दुसरे के प्रति हिंसा फैलेगी ।
जबकि आरक्षण का मौजुद फर्मुला जातियों की जनसंख्या पर ही आधारित है।अनुसूचित जाति-जनजाति की गणना 1951 से हो रही है और इसी के अनुसार इस तबके को आरक्षण तय है जबकि पिछड़े जातियों का आरक्षण 1931 के गणना पर ही अधारित है।साल 1951 से 2011तक की गणना में हर बार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन जाति का ही डेटा दिया गया लेकिन ओबोसी और दुसरी जातियों का नही ।
राष्ट्रीय दल विपक्ष में आने पर इसकी मांग करते है लेकिन सत्ता में आने पर जाति अधारित आकड़ा जारी करने में हिचकते है।सरकार को सबसे ज्यादा समस्या ओबीसी के आकड़ों को प्रकाशित करने में होती है ।
मंडल कमिशन के आधार पर कहा जाता है की भारत में ओबीसी की आबादी 52 प्रतिशत है हालाकि मंडल कमिशन ने साल 1931 की जनगणना को ही आधार बनाया था ।
इसके अलावा अलग -अलग राजनीतिक पार्टिया अपने चुनावी सर्वे के अनुमान के आधार पर इस आकड़े को कभी थोड़ा कभी ज्यादा आंकती है ।
केंद्र सरकार ने जाति के आधार पर कई नीतियाँ तैयार करती है ताजा उधाहरण नीट परीक्षा का ही है ।जिसमें ऑल इण्डिया कोटे से ओबोसी के लिये आरक्षण लागू करने की बात मोदी जी ने की है ।
बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार हमेशा कहते रहे है की समाज कल्याण व विकास की योजनाओं का वास्तविक लाभ वंचित तबको तक पहुचाने और योजनाओं की दशा -दिशा नये सिरे से तय करने के लिये जातिय गणना जरुरी है यानि जातिय गणना के आकड़े नीतियों कार्यक्रमों की दशा-दिशा बदलने का आधार बनेगे ।
जातिय जन गणना की कामयाबी कई मिथक को तोड़ेगे ।जातिय जनगणना न करवाने का बेबुनियाद तर्क कमजोर पड़ेगा की आज बहुतयात लोग सम्प्रदाय , गोत्र ,उपजाति व जाति का नाम बतौर सरनेम लिखते है ।उनके उच्चारण में भी समानता है।इससे जातियों के वर्गीकरण में समस्या होगी ।
फरवरी 2019 से 2020 – जातिय जनगणना कराने के लिये बिहार विधान मंडल में दो बार सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित हुआ था ।
20 जुलाई 2021 केंद्र ने संसद में कहा की इस बार जातिय जनगणना नही होगी ।सीएम नितीश कुमार ने इसकी जरुरत बताकर विधान मंडल से दो बार पारित प्रस्ताव का हवाला दिया ।
30 जुलाई 2021 तेजस्वी यादव के नेतृत्व में विरोधी दल के विधायक मुख्यमंत्री से मिले और प्रधान मंत्री से मिलने का आग्रह किया ।
6 दिसंबर 2021 मुख्य मंत्री ने कहा -जातिय जनगणना की पूरी तैयारी ,सर्वदलिये बैठक के लिए नेताओं से बात की । 2019 से शुरु हुई चर्चा 01 जून को सर्वदलीय बैठक पेर खत्म हुई ।सभी दलों की सहमती से ही बिहार में जातिय जन गणना का कार्य शुरु हुआ ।
गणना में आदिवासी और दलितों के बारे में पुछा जाता है ,बस गैर दलित और गैर आदिवासी की जाति नहीं पूछी जाति ।आर्थिक और समाजिक पिछड़ेपन के हिसाब से जिन लोगों के लिये सरकार नीतियाँ बनाती है,उससे पहले सरकार को ये पता होना चाहिये की आखिर उनकी जनसंख्या कितनी है ,जातिगत जनगणना के अभाव में ये पता लगना मुश्किल है की सरकार की निति और योजनाओं का लाभ सही जाति तक ठीक से पहुंच भी रहा है या नही ।

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