
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)19 सितंबर।अनन्त चतुर्दशी के अवसर पर श्रीसनातन शक्तिपीठ संस्थानम् तथा सनातन-सुरसरि सेवा न्यास द्वारा फ्रेंड्स कॉलोनी कार्यालय में आयोजित पूजन समारोह में प्रवचन करते हुए आचार्य डॉ भारतभूषण जी महाराज ने कहा कि अनन्त ब्रह्माण्ड हैं जिनमें अनन्त प्राणी कृतार्थ होने के लिए जन्म लेते रहते हैं।उन सभी प्राणियों की कामनाएं अनन्त हैं।उनको पूर्ण करनेवाले केवल भगवान ही हैं। भगवान श्रीमन्नारायण का मुख्य नाम और लक्षण दोनों ही अनन्त हैं।भगवती श्रुति तैत्तिरीयोपनिषद् में बोलती हैं कि जो सदा सत्य है, ज्ञान और अनन्त है वही ब्रह्म अर्थात् परमात्मा है।उस परात्पर परब्रह्म की उपासना और आश्रय छोड़ कर मन को विभिन्न मायिक-जागतिक असत्पदार्थों में निविष्ट करना आत्मवंचना और आत्मघात है। आचार्य ने इस क्रम में पौराणिक-ऐतिहासिक कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि राजसूय यज्ञ में पाण्डवों के वैभव को देखकर दुर्योधन, शकुनि आदि ने छलपूर्वक उन्हें जुए में हरा दिया तथा वन में भेज दिया। धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से अपने इस वनवास जनित विपत्ति से मुक्ति का मार्ग पूछा जिस पर भगवान ने अनन्त चतुर्दशी के व्रत और अनन्त भगवान की उपासना की विधि बताई। इस व्रतोपासना से अन्ततः युधिष्ठिर जी को विजय और साम्राज्य की प्राप्ति हुई। आचार्य ने कहा कि धर्म से ही भोग और मोक्ष दोनों सुलभ होते हैं। धर्म-विरुद्ध अथवा धर्मविरहित भोग इहलोक और परलोक दोनों का नाश कर देता है। उन्होंने कहा कि वर्षा ऋतु के दो महीने श्रावण और भाद्रपद तथा इनके चार पक्ष चातुर्मास व्रत के लिए होते हैं। इसमें तपस्या, स्वाध्याय और संयम का अभ्यास किया जाता है। इस अवधि में तमाम व्रत, त्योहार और महोत्सव भी मनाये जाते हैं। अनन्त चतुर्दशी को चातुर्मास व्रत संपन्न हो जाता है तथा व्रती सीमोल्लंघन करते हुए अपने-अपने गंतव्य को प्रस्थान करते हैं। कल से श्राद्ध पक्ष प्रारम्भ होता है जिसमें पितरों की विशेष उपासना तथा पंद्रह दिनों के बाद शारदीय नवरात्र आरंभ होंगे जिसमें मूल प्रकृति पराचितिस्वरूपा जगदंबा की उपासना होगी जो शरत्पूर्णिमा के शरदोत्सव के साथ संपन्न होगी।
