
फूल खिलने के बाद!
याद है खुल कर हँसना,
वो खिलखिलाना बचपन का।
नहीं खरीदा था बाजारों से,
उधार नहीं माँगी थी दरबारो से।
वो बचपना थीं,
सुनी थी प्यार की बातें,
वो अपनो बेगानो से।
कोई दुत्कार नहीं कोई द्वेष नहीं,
वो निश्छलता कहाँ खो गई।
क्यूँ कटता गया नागफनी बनता गया।
उम्र के बोझ तले बचपना क्यों घुटती गई।
टूटती गई श्रृखंला प्रेम का।
कम होता गया खिलखिलाना,
नन्ही पाँवो को किताबों की बोझ,
स्कूलो का होमवर्क,
शिक्षक की बेरुखी।
परीक्षाओ का दस्तक,
माँ-बाप की अभिलाषाएँ।
जिम्मेवारियो को नन्हे कदमों से,
जीवन में आने की आहटें,
हँसने की कला को क्षीण करती गई।
व समय के साथ गहरा होता गया,
चिंताओ की अनगिनत रेखाएँ।
लोगो की अपेक्षाएँ बढ़ती गई,
उम्र बढ़ने के साथ-साथ।
टूटता गया घरौंदा,
बचपन की मुस्काने,
जवानी में ख़ार सी होती गई।
द्वेष ईर्ष्या का बिष बेल बढ़ता गया,
छतनार होता गया गलतफहमियो का दरख़्त।
दूरियाँ बढती गई दिलो के बीच,
अजनबी होता गया गुलदानो के फूल।
छुटता गया परिवार टूटता गया,
वो प्रेम कड़वा होता गया,
खटास जीवन में बढ़ता गया।
उम्र क्या बढी मधुरता खोती गई।
सहजता में भी खोट तलाशी जाने लगी।
मानो बचपना क्या गई,
जीवन कोई सुनामी हो गया।
जैसे चक्रवात गुजरने के बाद,
तांडव की निशानियाँ छोड जाती है।
कुछ-कुछ उसी तरह का मंजर से,
दो-चार होना पड़ा।
जवानी की दहलीज पर।
आखिर क्यों बिखर जाती है,
कलियों की एक-एक पंखुड़ियां,
फूल खिलने के बाद।
फूल खिलने————-।

