प्रेमचंद ने आम आदमी के सपनों व संघर्षों को जुबान दिया : जितेंद्र कुमार

अंधराष्ट्रवाद और पाखंड के घोर विरोधी रचनाकार प्रेमचंद : रविंद्र नाथ राय

साहित्यकारों ने कवि धुमिल और महापंडित राहुल सांकृत्यायन की मूर्तियाँ तोड़े जाने की निंदा की।
RKTV NEWS/आरा (भोजपुर)03 अगस्त। रविवार को नागरी प्रचारिणी पुस्तकालय सभागार, आरा में प्रलेस, जलेस और जसम,आरा-भोजपुर की ओर से अमर कथाकार प्रेमचंद की 146वीं जयंती मनाई गई। इस अवसर पर “वर्तमान समय और प्रेमचंद” विषयक एक विचार-गोष्ठी का भी आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. मृत्युंजय सिंह, डॉ. रवींद्रनाथ राय, जितेंद्र कुमार,चितरंजन भारती एवं राजाराम प्रियदर्शी के संयुक्त अध्यक्ष मंडल ने की, जबकि मंच संचालन सुमन कुमार सिंह द्वारा किया गया।
अपने वक्तव्य में प्रो. मृत्युंजय सिंह ने कहा कि आज के दौर में प्रेमचंद को पढ़ना एक क्रांतिकारी कदम है। प्रेमचंद गाँधीवाद के समर्थक होने के साथ-साथ एक महान विचारक, पत्रकार और संपादक भी थे। उनका साहित्य स्वतंत्रता संग्राम के साथ विकसित हुआ। उन्होंने हिंदी साहित्य की मजबूत नींव रखी।
उन्होंने कहा कि भले आज बेरोजगार, छात्र-नौजवानों, किसानों व न्याय पसंद लोगों की बातें सरकार न सुने, लेकिन एक संवेदनशील लेखक हमेशा सुनता है। प्रेमचंद ने भी सुनी।
प्रो. रवींद्रनाथ राय ने कहा कि प्रेमचंद में सच्ची देशभक्ति थी, लेकिन अंध-राष्ट्रवाद की संकीर्ण भावना नहीं थी। वे साझी भारतीय संस्कृति के समर्थक थे। आज जब देश सांप्रदायिक फासीवाद के दौर से गुजर रहा है, तब उनके पात्र व उनकी रचनाएँ हमें काफी प्रेरित करती हैं। प्रो. राय ने प्रेमाश्रम के हवाले से कई अन्य महत्वपूर्ण बातों का भी उल्लेख किया।
अपने संबोधन में जसम के राज्य अध्यक्ष जितेंद्र कुमार ने कहा कि प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में आम आदमी के सपनों व संघर्षों को जुबान दी। आज जब भारत नव साम्राज्यवाद के चंगुल में फँसा हुआ है, तब ऐसे में प्रेमचंद के समता मूलक समाज की मजबूत वैचारिकी हमें काफी ताकत देती है। रंगभूमि और उसके सूरदास का प्रतिवाद हमारी आँखें खोलते हैं।
कार्यक्रम के आरंभ में कवि नीलांबुज सरोज ने कहा कि प्रेमचंद के साहित्य में उनका क्रमश: वैचारिक विकास दिखाई देता है। यदि आज प्रेमचंद होते तो तमाम हमलो व चुनौतियों के बावजूद भी इस समय को और अधिक गंभीरता से व्यक्त कर रहे होते। वहीं कवि राजाराम प्रियदर्शी ने कहा कि आजकी पीढी़ के लिए प्रेमचंद की रचनाएँ बेहद प्रेरक हैं। जब लोकतंत्र व न्याय व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हों, तब ‘पंच-परमेश्वर’ कहानी सहज ही हमारा मार्ग-दर्शन करती है। पटना से आये कहानीकार चितरंजन भारती ने इस बदलते दौर में पुस्तक संस्कृति पर गहराते संकट पर चिंता जताई। इसी कड़ी में डॉ. नवनीत राय ने बताया कि प्रेमचंद किसान-मजदूरों के कालजयी रचनाकार हैं। बलिदान कहानी के हवाले से डॉ. राय ने कहा कि प्रेमचंद के किसान कठिन क्षणों में भी आत्महत्या नहीं, बल्कि संघर्ष की प्रेरणा देते हैं। इस संदर्भ को उन्होंने विदर्भ व देश के अन्य क्षेत्रों के किसानों की आत्म हत्या की मन:स्थिति से जोड़कर देखा।
युवा शिक्षक व समीक्षक सुनील श्रीवास्तव ने कहा कि आज देश के लोकतंत्र पर हमला हो रहा है, संविधान पर खतरे मंडरा रहे हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लगतार कम हो रही है। ऐसे समय में प्रेमचंद के बताए संघर्ष व प्रतिरोध के मार्ग पर चलने की सख्त जरूरत है।
कवि ओमप्रकाश मिश्र ने कहा कि आज का समय प्रेमचंद के समय से ज्यादा बहुस्तरीय और हिंसक है। ऐसे दौर में प्रेमचंद बार-बार याद आते हैं।
प्रो.अयोध्या प्रसाद उपाध्याय ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि प्रेमचंद के साहित्य में समाज के गरीब तबकों का जीवन वैविध्य संपूर्णता में दिखाई पड़ता है। वे व्यापक भारतीय जनमानस के रचनाकार हैं।
दस्तक पत्रिका के संपादक कहानीकार-कवि रामयश ‘अविकल’ ने कहा कि प्रेमचंद दलित जीवन पर लिखने वालों में वैसे अग्रणी रचनाकर हैं, जिन्होंने सामाजिक विकृतियों का बेबाक चित्रण किया।
डॉ. लक्ष्मी कुमारी ने प्रेमचंद के स्त्रीवादी दृष्टिकोण से लोगों को परिचित कराया। उन्होंने कहा कि जिस तरह से प्रेमचंद ने अपने स्त्री चरित्रों को अत्यंत सशक्त तरीके से उभारा है, उससे आज की स्त्रियों को प्रेरणा मिलती है। कवि जनार्दन मिश्र ने प्रेमचंद को जनवादी प्रगतिशील चेतना के सच्चे वाहक के रूप में याद किया। अन्य वक्ताओं में कथाकार डा. सिद्धनाथ सागर व रणधीर राणा ने भी अपने विचार व्यक्त किये।
उपस्थित लेखक-संस्कृतिकर्मियों ने बंगाल के रानीगंज में महान भारतीय लेखक राहुल सांकृत्यान और वाराणसी के लोहता क्षेत्र के विट्ठलपुर में कवि सुदामा पाण्डेय ‘धुमिल’ की मूर्तियों को असामाजिक तत्वों द्वारा तोड़े जाने की निंदा की। विद्वानों ने देश भर में बढ़ते इस तरह के सांस्कृतिक हमले पर चिंता जताते हुए हमलावर अराजक तत्वों के खिलाफ कड़ी कार्यवाई की माँग की।
कार्यक्रम में युवा रंगकर्मी सूर्यप्रकाश, धनंजय सिंह, अमित मेहता व पटना के साथी रंगकर्मी राजन ने जन-गीतकार विजेंद्र अनिल के गीतों को गाकर जहाँ गोष्ठी को और सार्थक ऊँचाई प्रदान की, वहीं कवि राकेश ओझा ने अपनी कविता के जरिये अपने मंतव्य को व्यक्त किया।
कार्यक्रम में वरिष्ठ रंगकर्मी कृष्णेंदु, आशुतोष कुमार पाण्डेय, विक्रांत कुमार,अनिल वर्मा, डब्बू जी, धनंजय कटकेरा,कवि संतोष श्रेयांश, कवयित्री ममता मिश्रा, बृजभूषण प्रसाद, ए के अंजान, कुमार रविंद्र, रविप्रकाश सूरज, विजय मेहता, रामनाथ ठाकुर, शिव कुमार रवि, उमेश कुमार सुमन, साजन राम आदि की उपस्थिति अंत तक बनी रही। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों का धन्यवाद ज्ञापन रंगकर्मी सूर्य प्रकाश ने किया।

