
RKTV NEWS/रवींद्र पांडेय 23 अक्टूबर।सड़कें खुश हैं। बहुत खुश। फुटपाथ वालों की भी बल्ले बल्ले हो गई है। कल तक भगाते थे। अतिक्रमण हटाओ। इधर से भागो। अब मजा आ रहा है। बड़े साहब खुद पड़ोसी बन गए हैं। अब फुटपाथ पर चाय साथ पिएंगे।
सबके दिन फिरते हैं। सड़कों के भी फिरे। पहले पता नहीं था। अब खुलासा हुआ है – सरकार सड़कें क्यों चमका रही थी। गांव-गांव तक क्यों पहुंचा रही थी? फैसला हो गया है। मांगें मान ली गई हैं। सरकार अब संसद से नहीं चलेगी। सड़क से चलेगी। पहले विपक्षी सड़क पर टेंट लगाते थे। अब सरकार ने लगा लिया है। विपक्षी अब हवा में तंबू तानने की सोच रहे हैं।
जिले की सड़कें झूम रही हैं। तैयारी जोरों पर है। कलेक्टर साहब की पटरी सज रही है। जनता-जनार्दन और फरियादियों के बैठने के लिए बिजली विभाग वालों ने पोल उपलब्ध करा दिए हैं। भवन निर्माण विभाग वाले भी ईंटें लेकर आ गए हैं। दस ईंटें दाएं, दस ईंटें बाएं सजा दी गई हैं। ऊपर से बिजली का सीमेंट वाला पोल जमा दिया गया है। पोल की चौड़ाई भी ठीक-ठाक है। चाहें तो पालथी लगा सकते हैं। कुर्सी पर ऐसा आराम कहां? रही बात पीठ टिकाने की, तो सरकार के सामने कौन पीठ टिका कर बैठता है! इतनी इज्जत तो सरकार को मिलनी ही चाहिए।
सुनने में आया है कि राजधानी में बड़ा सा पंडाल बन रहा है। सारे सत्र वहीं चलेंगे। सड़क पर।
एक आदमी बोला, ‘अच्छा है। अब कार्यवाही टीवी पर नहीं देखनी पड़ेगी। सामने बैठ कर देखेंगे। लाइव।’
दूसरा बोला, ‘सुरक्षा का बहाना मत बनाना। जैसे आप, वैसे हम। आपकी ही सुरक्षा क्यों?… हम धूप में जलेंगे और आप एसी में? ये नहीं चलेगा। हमारे लिए भी खादी की बंडी सिलवाइए। हम अच्छे दिखेंगे तो अंतरराष्ट्रीय पटल पर आपकी भी इज्जत बढ़ेगी।’
जितने मुंह, उतनी चर्चा।
वैसे आइडिया बुरा नहीं है। जब सरकार ही सड़क पर होगी तो आंदोलन के लिए सड़क जाम करने का झंझट ही खत्म। आखिर सड़कें जाम क्यों होती हैं? लोग अपना काम करवाने के लिए इधर से उधर भागते हैं। अब सरकार खुद दरवाजे पर आएगी। घर-घर घूमेगी।
सीन कुछ ऐसा होगा –
सरकार पूछेगी, ‘हां जी, बोलिए क्या समस्या है?’
नौजवान खड़ा होगा, हाथ में मोबाइल, ‘सरकार जी प्रणाम। रेंज नहीं आती। रील अपलोड नहीं हो रही। बस गोल-गोल घूमता रहता है। हमारा क्रिएटिव टाइम वेस्ट हो रहा है।’
मंत्री जी तुरंत एक्शन में। बोले, ‘देखो भाई, जल्दी रील अपलोड करना मौलिक अधिकार है। और लोग फ्री में थोड़े मांग रहे हैं? तुम्हारा सिम छाती से लगाए घूम रहे हैं। पंद्रह दिन में समस्या दूर करो।’
फिर फोटो खिंचवाएंगे। मुस्कुराते हुए। कैप्शन डालेंगे। फलां गांव में रील क्रिएटर्स की समस्या का समाधान किया।
मंत्री जी फिर पूछेंगे, ‘और बताओ, खेती-बाड़ी की कोई समस्या?’
नौजवान कहेगा, ‘अरे ना सरकार। खेती में कोई दिक्कत नहीं। खाद-बीज, सिंचाई, ये सब तो हम संभाल लेते हैं। इन समस्याओं से लड़ने की क्षमता हमारे खून में विकसित हो गई है। यह रील अपलोड वाली समस्या बड़ी है। अभी कुछ सालों से आई है न! इसके लिए अभी हम जुगाड़ टेक्नोलॉजी डेवलप नहीं कर पाए हैं।’
उधर न्याय विभाग वाले भी गांव-गांव घूम रहे हैं। आवाज लगा रहे हैं, ‘हां जी, इस गांव के कितने लोग कचहरी जाते हैं? आ जाओ सब। कल से कोई कचहरी में दिखना नहीं चाहिए। यहीं बताओ। हाथों-हाथ फैसला। त्वरित न्याय। तारीख पे तारीख खत्म।’
प्रशासन जब सड़क पर है, तो अपराध तो वैसे ही भाग गया है। चोरी, डकैती, राहजनी, हत्या… सब छू-मंतर। क्राइम का ग्राफ औंधे मुंह गिर गया है। उसके दो-तीन दांत भी टूट गए हैं।
जनगणना वाले भी अब सुधर गए हैं। पहले फालतू सवाल पूछते थे, ‘घर में टीवी है? शौचालय है?’ ये भी कोई सवाल है? अब असली सवाल पूछ रहे हैं, ‘बिना बीड़ी-सिगरेट या तंबाकू के शौच हो जाता है? अच्छा, यह बताओ कि तंबाकू मांगकर खाते हो या खरीद कर? खुलकर बोलो। घबराओ मत। तुम्हारा डाटा गोपनीय रहेगा। इतना तो भरोसा तुम सरकार पर कर सकते हो।’
रोजगार का टेंशन भी खत्म। अब रोजगार ढूंढ़ना नहीं पड़ता।

रोजगार विभाग खुद पकड़-पकड़ कर रोजगार दे रहा है। माइक पर चिल्ला रहे हैं, ‘हां भाई, किस-किस को रोजगार चाहिए? किसको क्या बनना है? डॉक्टर? इंजीनियर? क्लर्क? चपरासी? अलग-अलग लाइन में खड़े हो जाओ। कोई छूटना नहीं चाहिए।’
शाम को रोजगार मंत्री भावुक पोस्ट डालते हैं, ‘भई, अपना देश है। अपनी सरकार है। अपने परिवार की तरह ख्याल रखती है। कोई पिता अपने बेटे से थोड़े कहता है कि आवेदन लिख कर दो, विचार करेंगे। पिता तो अपनी पूरी ताकत झोंक देता है। वैसे ही आपकी सरकार भी झोंक रही है। सरकार भले बेकार हो जाए, जनता को बेकार नहीं होने देगी।’
ये सब देख कर बेचारी रेल की पटरियां उदास हैं। मन ही मन कुढ़ रही हैं। हममें क्या कमी है? हम तो हमेशा अनुशासन में चलती हैं। लाइन से कभी नहीं भटकतीं। फिर सड़क से ही क्यों चलेगी सरकार? पटरियों से क्यों नहीं?
तभी किसी ने एक रील वायरल कर दी।
कुछ नहीं हुआ है। ख्याली पुलाव मत पकाइए। सड़कों ने तहकीकात की है। पता लगाया है कि ये सरकार है कौन? और, आती कहां से है? पता चल गया है। असली सरकार तो पहले से भी सड़क पर ही है। … फिर ये किस सरकार को सड़क से चलाने की बात उड़ रही है?
